हिंद स्वराज्य-4 -
गांधी और गांधीवाद-149संदर्भ और पुराने पोस्टों के लिंक यहां पर1909हिंद स्वराज्य-4स्वदेशी और ग्राम समाज‘हिंद स्वराज’ एक ऐसे समाज की बात करता है जो पिरामिड नहीं है। यह ऊंचाई के साथ चौड़ाई में प्रसारित होता है। यह समाज भारत..
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हिंद स्वराज्य-4 -
गांधी और गांधीवाद-149संदर्भ और पुराने पोस्टों के लिंक यहां पर1909हिंद स्वराज्य-4स्वदेशी और ग्राम समाज‘हिंद स्वराज’ एक ऐसे समाज की बात करता है जो पिरामिड नहीं है। यह ऊंचाई के साथ चौड़ाई में प्रसारित होता है। यह समाज भारत का ग्राम समाज है। गांधी जी ग्राम समाज के साथ साथ स्वदेशी को प्रमुखता देते हैं। इसके लिए वे विकेन्द्रीकरण का पक्ष लेते हैं। दरिद्रता, अशिक्षा आदि के बावजूद गांधी जी ने ग्राम में ही भारतीय आदर्श समाज के मूल सूत्रों को प्रत्यक्ष किया। मनुष्य के साथ मनुष्य का आत्मीय संबंध चिरकाल से भारत की चेष्टा रही है। ग्राम समाज को गांधी जी आत्मीय समाज मानते थे। इसमें समवाय यानी सर्वोदय की भावना अनुस्यूत है। गांधी जी कहते हैं, “व्यक्ति के पास हृदय होता है मगर राष्ट्र हृदयहीन मशीन की तरह है। आजकल नगरों में राष्ट्रनीति के साथ वाणिक शक्ति आ मिली है।” गांव को केन्द्र में लाने के लिए उन्होंने स्वदेशी का पक्ष लिया। स्वदेशी केवल प्रत्यावर्तन नहीं है, यह एक स्थायी उपाय ढूंढ़ना है। गांव को स्वनिर्भर बनाकर शहर के शोषण से मुक्त रखना है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए रास्ता समवाय का है। यही सत्य का रास्ता है। यह सत्य तपस्या द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। समवाय नीति मनुष्यत्व की मूल नीति है। मनुष्य के सहयोग से ही मनुष्य मनुष्य है।गांधी जी यंत्र के विरोधी नहीं थे, वे यांत्रिकता के विरोधी थे। यंत्र भोग को बढ़ावा देता है। भोग स्थायी तृप्ति नहीं दे सकता। संयम के द्वारा ही जीवन में तृप्ति संभव है। भोग की दृष्टि में सभी उपकरण हैं। ऐसी स्थिति में प्यार भी उपकरण बन जाता है। गांधी जी भोग की वासना को नैतिकता के द्वारा उसको नियंत्रित करना चाहते थे। इस नैतिकता का उत्स प्रेम की शक्ति में था। गांधी जी हमें पश्चिम की ओर जाने से सचेत करते हैं। वे हमें विदेश को अपने ढंग से, अपनी शर्तों पर स्वीकार करने के लिए रास्ता दिखाते हैं। आधुनिकता को हमें अपने ढंग से परिभाषित करने में सहायता करते हैं। हमारी आधुनिकता परंपरा और पाश्चात्य आधुनिकता को जोड़ कर नहीं, उनके इंटरप्रेटेशन के द्वारा एक नयी संरचना की सृष्टि की सहायता से विकसित हुई है।द्वेषधर्म की जगह प्रेमधर्म यह पुस्तक द्वेषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है। हिंसा की जगह आत्मबलिदान में विश्वास रखती है। पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल खड़ा करती है। उनका मानना था कि अगर हिंदुस्तान अहिंसा का पालन किताब में उल्लिखित भावना के अनुरूप करे तो एक ही दिन में स्वराज्य आ जाए। हिंदुस्तान अगर प्रेम के सिद्धांत को अपने धर्म के एक सक्रिय अंश के रूप में स्वीकार करे और उसे अपनी राजनीति में शामिल करे तो तो स्वराज स्वर्ग से हिंदुस्तान की धरती पर उतरेगा। लेकिन उन्हें इस बात का एहसास और दुख था कि ऐसा होना बहुत दूर की बात है। इस पुस्तक में गांधी जी ने आध्यात्मिक नैतिकता की सहायता से हमारी अर्थनैतिक और सैनिक कमजोरी को शक्ति में बदल दिया। अहिंसा को हमारी सबसे बड़ी शक्ति बना दी। सत्याग्रह को अस्त्र में बदल दिया। सहनशीलता को सक्रियता में बदल दिया। इस प्रकार शक्तिहीन शक्तिशाली हो गया। उनका कहना था कि हिंसा भारत के दुखों का इलाज नहीं है। भारतीय संस्कृति का अनुसरण करते हुए आत्मरक्षा के लिए अहिंसा और सत्याग्रह का प्रयोग ही उचित है। अहिंसा हमारा आध्यात्मिक तत्त्व है। गांधी जी ने इसका इस्तेमाल सैनिक और आर्थिक शक्ति के विरोध में किया। इस प्रकार एक दुर्बल तत्व को उन्होंने सबल बना दिया। सत्याग्रह के रूप में शांतिपूर्ण प्रतिरोध द्वारा उन्होंने क्रियात्मक स्थिति पैदा की। हिंसा मनुष्य शरीर का अनादर करता है। शरीर में ईश्वर का निवास है। गांधी जी धर्म का मूल दया मानते हुए सत्याग्रह के द्वारा दया, बल और आत्मबल के प्रसार की बात करते हैं और हिंसा को रोकने के लिए उसका प्रयोग करते हैं।गांधी जी के स्वराज के लिए हिंदुस्तान न तब तैयार था न आज है। यह आवश्यक है कि उस बीज ग्रंथ का हम अध्ययन करें। सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों के स्वीकार में अंत में क्या नतीजा आएगा, इसकी तस्वीर इस पुस्तक में है । मशीनी सभ्यता मशीनी सभ्यता ने जिस तरह पृथ्वी के पर्यावरण को नष्ट किया है उसका परिणाम आज सामने है। आर्थिक साम्राज्यवाद ने विश्व में गैर बराबरी को और भी बढ़ाया है जिसके कारण विश्व में हिंसा का आतंकवाद बढ़ा है। ऐसी स्थिति में, हिंद स्वराज में जैसी सभ्यता व राज्य की कल्पना की गई है वह सम्पूर्ण विश्व के सामने विकल्प के रूप में है, जिसे आजमाया जाना चाहिए। ‘हिन्द स्वराज’ के द्वारा गांधी जी ने हमें आगाह किया है कि उपनिवेशी मानसिकता या मानसिक उपनिवेशीकरण हमारे लिए बहुत खतरनाक सिद्ध हो सकता है। उन्होंने हिन्द स्वराज के माध्यम से एक ‘भविष्यद्रष्टा’ की तरह पश्चिमी सभ्यता में निहित अशुभ प्रवृतियों का पर्दाफ़ाश किया।गांधी जी के यंत्रों के विरोध को कई समालोचक इसे अकारण मानते हैं। मिडलटन मरी का कहना है, “गांधी जी अपने विचारों के जोश में यह भूल जाते हैं कि जो चरखा उन्हें बहुत प्यारा है, वह भी एक यंत्र ही है और कुदरत की नहीं, लेकिन इन्सान की बनाई हुई एक अकुदरती कृत्रिम चीज़ है। उनके उसूल के मुताबिक तो उसका भी नाश होना है।”डिलाइल बर्न्स इसे बुनियादी विचार-दोष मानते हुएकहते हैं, “किसी भी यंत्र का बुरा उपयोग होने की संभावना रहती है। लेकिन अगर ऐसा हो तो उसमें रही हुई नैतिक हीनता यंत्र की नहीं, लेकिन उसका उपयोग करने वाले मनुष्य की है।”1924 में गांधी जी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था, “मैं तमाम यंत्रों के ख़िलाफ़ कैसे हो सकता हूं? मेरा विरोध यंत्रों के लिए नहीं है, बल्कि यंत्रों के पीछे जो पागलपन चल रहा है, उसके लिए है। आज तो जिन्हें मेहनत बचानेवाले यंत्र कहते हैं, उनके पीछे लोग पागल हो गए हैं। उनसे मेहनत ज़रूर बचती है, लेकिन लाखों लोग बेकार होकर भूखों मरते हुए रास्तों पर भटकते हैं। समय और श्रम की बचत तो मैं भी चाहता हूं, परंतु वह किसी खास वर्ग की नहीं, बल्कि सारी मानव जाति की होनी चाहिए। कुछ गिने-गिनाए लोगों के पास संपत्ति जमा हो, ऐसा नहीं, बल्कि सबके पास जमा हो, ऐसा मैं चाहता हूं। आज तो करोड़ों की गर्दन पर कुछ लोगों के सवार हो जाने में यंत्र मददगार हो रहे हैं। यंत्रों के उपयोग के पीछे जो प्रेरक कारण है, वह श्रम की बचत नहीं है, बल्कि धन का लोभ है। ... मेरा मकसद तमाम यंत्रों का नाश करने का नहीं है, बल्कि उनकी हद बांधने का है।”पाश्चात्य आधुनिकता का विरोध गांधी जी इस निर्णय पर पहुंचे थे कि पश्चिम के देशों में जो आधुनिक सभ्यता ज़ोर कर रही है, वह कल्याणकारी नहीं है। मनुष्य-हित के लिए वह सत्यानाशकारी है। ‘हिन्द स्वराज’ में उन्होंने पाश्चात्य आधुनिकता का विरोध कर हमें यथार्थ को पहचानने का रास्ता दिखाया। उनका मानना था कि भारत और सारी दुनिया में प्राचीन काल से जो धर्मपरायण नीति प्रधान सभ्यता चली आई है, वह सच्ची सभ्यता है। इस पुस्तक में गांधी जी कहते हैं, “मैंने जो कुछ कहा है, वह अंग्रेज़ों के प्रति द्वेष के कारण नहीं, उनकी सभ्यता के प्रति द्वेष के कारण कहा है।” उनका कहना था कि भारत से केवल अंग्रेज़ों को हटाने से भारत को अपनी सच्ची सभ्यता का स्वराज नहीं मिलेगा। हम अंग्रेज़ों को हटा दें और उन्हीं की सभ्यता और आदर्शों को अपना लें तो हमारा उद्धार नहीं होगा। गांधी जी कहते हैं, “यह सभ्यता ऐसी है कि अगर हम हाथ पर हाथ धर के बैठे रहेंगे तो इस सभ्यता की चपेट में आये हुए लोग ख़ुद की जलाई हुई आग में जल मरेंगे।” हमें अपनी आत्मा को बचाना चाहिए। ग्राम विकास इसके केन्द्र में है। रेलों, अदालतों, डॉक्टरों और प्रशासकों पर आधारित आधुनिक सभ्यता की समझौता-विहीन निंदा करने वाले और शिक्षा-प्रणाली में ज्ञान-विज्ञान की वकालत करने वाले गांधी जी ने वैकल्पिक टेक्नॉलोजी के साथ-साथ स्वदेशी और सर्वोदय को महत्व दिया तथा सशक्तिकरण का मार्ग दिखाया। उनके इस मॉडेल के अनुसरण से एक नैतिक, आर्थिक, आध्यात्मिक और शक्तिशाली भारत का निर्माण संभव है। पश्चिम में जिस प्रकार लोकतंत्र का विकास हुआ है वह ऐसा कोई आदर्श समाज सुनिश्चित नहीं कर सकता। अपने मनुष्यत्व को समझ लेने वाला मनुष्य केवल ईश्वर से डरता है। अगर मनुष्य केवल यह समझ ले कि अन्यायपूर्ण नियमों का पालन करना मनुष्योचित नहीं है, तो कोई भी निरंकुश शासन उसे कभी दास नहीं बना सकता। यह स्वशासन या स्वराज्य का मूल मंत्र है। केवल वह समाज स्वतंत्र, प्रसन्न और रहने योग्य होता है जिसमें हर स्त्री-पुरुष एक संभावित सविनय अवज्ञाकारी हो। इस पुस्तक में गांधी जी का आत्मविश्वास एक ऐसे सभ्यता के प्रामाणिक प्रतिनिधि का आत्मविश्वास है, जो आत्म-प्रतिष्ठा और आत्म-ज्ञान को ही सब ज्ञानों का ज्ञान और प्रमाण मान कर चलता है।भारतीय सभ्यता की विशेषता है कि वह व्यक्ति को भोग से दूर रखता है। इसीलिए आधुनिक सभ्यता का भारतीय सभ्यता से मेल नहीं है। आधुनिक सभ्यता का लक्ष्य भौतिक उन्नति है। इसके लिए तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। तकनीक पर्यावरण को नष्ट करता है। यह भोग और हिंसा को बढ़ावा दे रहा है। यह चिंतनीय स्थिति हमारे समक्ष चुनौतियां पैदा कर रही है। हमें पर्यावरण के साथ मनुष्य के एक मत होने के रास्ते को ढूंढ़ निकालना होगा। यह प्राचीन भारतीय रास्ता है। इसे पर्यावरण प्रभावित नैतिकता कह सकते हैं। कई समालोचक ‘हिन्द स्वराज’ में गांधी जी के सुझाये गए आधुनिक सभ्यता के विकल्प को गंभीरतापूर्वक विचार करने योग्य नहीं पाते। गांधी जी मानते हैं कि इतिहास अस्वाभाविक बातों को दर्ज़ करता है। सामान्य प्रजा सत्याग्रह के बूते जीती है, वह सत्याग्रह इतिहास में दर्ज़ नहीं होता। इसलिए इतिहास पर भरोसा करना या उसके आधार पर निष्कर्ष निकालना ग़लत होगा। गांधी जी मानते हैं कि हिन्दुस्तान का बल सत्याग्रह या आत्मबल या करुणा का बल है। इसलिए दूसरे इतिहासकारों से हमारा कम संबंध है। दूसरी सभ्यताएं मिट्टी में मिल गयीं, जबकि हिन्दुस्तानी सभ्यता को आंच नहीं आयी है।लेकिन गांधी जी आज के बुद्धिजीवियों की तरह विउपनिवेशीकरण तक अपने को सीमित नहीं रखते। वे स्वराज में अन्य के लिये भी स्थान देते हैं। कोलोनाइज़र और कोलोनाइज़्ड दोनों की स्वाधीनता को उन्होंने स्वीकृति दी है। इस तरह ‘हिंद स्वराज’ एक वैकल्पिक स्थिति पैदा करता है। एक वैकल्पिक मूल्य-व्यवस्था की रचना करता है। यह भारतीय आधुनिकता की सबसे प्रमुख बात है। जबकि पाश्चात्य आधुनिकता में एक को बहिष्कृत कर दूसरे को प्रतिष्ठित करने की बात है। भारत समायोजन के द्वारा अपना विकास करता है। पश्चिम प्रतिस्थापन के द्वारा विकसित होता है। भारत में प्राचीन विचार खो नहीं जाते, नवीन विचार के साथ सहवस्थान करते हैं। यहां एक का बहिष्कार कर अपनी आधुनिकता की रचना नहीं की जाती। यहां विकल्पों को स्वीकारा जाता है। इसमें सिर्फ़ विकास की बात नहीं, खुद को पहचानने की बात है, खुद के स्वाधीनता की बात है। यह आधुनिकता से परंपरा के जोड़ने की बात नहीं है, अंतर्वेशन के द्वारा आधुनिकता की नई संरचना के निर्माण की बात है। यहां वादों, जैसे परंपरावाद, जातिवाद आदि, के तिरस्कार की बात है।स्वतंत्रता और उसके बादगांधी जी के बताए हुए अहिंसा के मार्ग पर चलकर देश स्वतंत्र हुआ। असहयोग, सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह ने चमत्कार किया। हमें स्वराज मिला, लेकिन हमने गांधी जी की जीवन-दृष्टि को पूरी तरह से नहीं अपनाया। धर्मपरायण, नीति-प्रधान पुरानी संस्कृति से प्रतिष्ठित शिक्षा पद्धति नहीं अपनाई। पश्चिम के विज्ञान और यांत्रिक कौशल्य का सहारा लिया। जो लोग आत्मवाद, सर्वोदय, अहिंसक शोषण-विहीन समाज-रचना, ग्राम-राज्य की स्थापना, मानस-परिवर्तन, आदि के द्वारा सामाजिक जीवन में आमूल क्रांति की वकालत कर रहे थे, उन्होंने भी माना कि पश्चिम के विज्ञान और यंत्र-कौशल्य के बिना सर्वोदय अधूरा ही रहेगा। सन 1947 के बाद उत्तर-उपनिवेशवादी युग में विकास के पश्चिमी दृष्टिकोण, आधुनिक प्रौद्योगिकी और पाश्चात्य आधुनिक अवधारणा की सहायता से पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत के अर्थनैतिक विकास को संभव बनाने का प्रयत्न किया। कई विचारकों, जिसमें गुनर मिरदाल भी शामिल थे, का विचार था कि भारत जैसे पारंपरिक समाज जब तक अपनी प्राचीन मूल्यव्यवस्था से मुक्त होकर आधुनिकीकरण की ओर नहीं बढ़ेगा, तब तक उसका विकास संभव नहीं।गांधी जी मूलतः एक संवेदनशील व्यक्ति थे। वे अपने सिद्धांतों की कद्र करने वाले भी थे। उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता को, परंपरागत भारत के समर्थक होने के बावजूद भी, अच्छी तरह पढा, समझा और फिर उसका विवेचनात्मक खंडन भी किया। उनके सामने यह बात स्पष्ट थी कि भारतीय-आधुनिकता सीमित होते हुए भी प्रभावी है। वर्तमान आर्थिक विश्वसंकट में गांधी जी की यह पुस्तक विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो उठी है। हालाकि कुछ खास वर्ग के लोग सोचते हैं कि गांधी जी देश को सौ वर्ष पीछे ले जाना चाहते हैं। लेकिन आज भारत हर संकट को पार कर खड़ा है। 1945 में गांधी जी के इस मत को कि देश का संचालन ‘हिंद स्वराज’ के माध्यम से हो, नेहरू जी ने ठुकरा दिया था। नेहरू जी का मानना था कि गांव स्वयं संस्कृतिविहीन और अंधियारे में हैं, वे क्या विकास में सहयोग करेंगे। लेकिन आज भी हम पाते हैं की भारत रूपी ईमारत की नींव में गांव और छोटी आमदनी के लोग हैं। गांधी जी का ‘हिंद स्वराज’ इस वैश्वीकरण के दौर में भी तीसरी दुनिया के लिए साम्राज्यवादी सोच का विकल्प प्रस्तुत करता है।***
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