-कबीर गूंगा हूआ बावरा बहरा हूआ कान॥
पावहु ते पिंगल भईआ मारिआ सतिगुर बान॥१९३॥
कबीर जी कहते हैं कि जब कोई सच्चा गुरु साधक पर कृपा करता है तो साधक गूंगे और बहरे की तरह बाँवरा-सा नजर आने लगता हैं। ऐसा देखने वालो को लगने लगता है कि साधक दुनियावी..
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-कबीर गूंगा हूआ बावरा बहरा हूआ कान॥
पावहु ते पिंगल भईआ मारिआ सतिगुर बान॥१९३॥
कबीर जी कहते हैं कि जब कोई सच्चा गुरु साधक पर कृपा करता है तो साधक गूंगे और बहरे की तरह बाँवरा-सा नजर आने लगता हैं। ऐसा देखने वालो को लगने लगता है कि साधक दुनियावी कार-विहार के लिये अब नकारा हो गया है।किसी काम का नही रहा।ऐसा साधक चलना छोड देता है अर्थात उस के मन मे संतोष आ जाता है जिस कारण उस की इच्छाओं पर अंकुश लग जाता है।यह सब सतगुरू की कृपा से ही होता है।
कबीर जी कहना चाहते हैं कि सतगुरू की कृपा होने पर जीव का जीने का ढंग ही बदल जाता है। वह प्रभुमय हो जाता है।इसी लिये उस का व्यवाहर ऐसा हो जाता है जिसे दुनियावी दृष्टि से बावरा कहते हैं।
कबीर सतिगुर सूरमे बाहिआ बानु जु ऐकु॥
लागत ही भुइ गिरि परिआ परा करेजे छेकु॥१९४॥
कबीर जी आगे कहते हैं कि सतगुरू के इस बाण का असर ऐसा होता है कि जीव कितना ही मोह माया से ग्रस्त रहा हो लेकिन जब यह सतगुरु का कृपा रूपी बाण उसे लगता है तो उस के ह्र्दय पर ऐसा असर डालता है कि परमात्मा के रंग में हमेशा के लिये रंग जाता है।फिर वह उसी में डूबा रहता है।
कबीर जी हमे सतगुरू की महिमा के बारे में बताना चाहते हैं कि उसकी कृपा रूपी बाण जब किसी जीव को लगता है तो वह माया मे कितना ही पहले लिप्त रहा हो लेकिन सतगुरू की कृपा रूपी बाण लगने के कारण उस के भीतर प्रभू भक्ति की जोत जलने लगती है।अर्थात फिर उस साधक को परमात्मा की भक्ति के सिवा कुछ नही भाता।
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