मिला जिससे हमें जीवन उसे एक दिन में बंधवाती . -
सम्मानित ब्लोगर्स नमस्कार आप सभी से सादर अनुरोध है की आपको मेरी इस ग़ज़ल में जो भी त्रुटि एक ग़ज़ल के हिसाब से दिखें आप सभी उसका सुधार मुझे यहीं बताएं .मैं आप सभी की आभारी रहूंगी .कृपया बत..
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मिला जिससे हमें जीवन उसे एक दिन में बंधवाती . -
सम्मानित ब्लोगर्स नमस्कार आप सभी से सादर अनुरोध है की आपको मेरी इस ग़ज़ल में जो भी त्रुटि एक ग़ज़ल के हिसाब से दिखें आप सभी उसका सुधार मुझे यहीं बताएं .मैं आप सभी की आभारी रहूंगी .कृपया बताएं अवश्य . शालिनी कौशिक तरक्की इस जहाँ में है तमाशे खूब करवाती ,मिला जिससे हमें जीवन उसे एक दिन में बंधवाती .महीनों गर्भ में रखती ,जनम दे करती रखवाली ,उसे औलाद के हाथों है कुछ सौगात दिलवाती .सिरहाने बैठ माँ के एक पल भी दे नहीं सकते ,दिखावे में उन्हीं से होटलों में मंच सजवाती .कहे माँ लाने को ऐनक ,नहीं दिखता बिना उसके ,कुबेरों के खजाने में ठन-गोपाल बजवाती .बढ़ाये आगे जीवन में दिलाती कामयाबी है ,उसी मैय्या को औलादें, हैं रोटी को भी तरसाती .महज एक दिन की चांदनी ,न चाहत है किसी माँ की ,मुबारक उसका हर पल तब ,दिखे औलाद मुस्काती .याद करना ढूंढकर दिन ,सभ्यता नहीं हमारी है ,हमारी मर्यादा ही रोज़ माँ के पैर पुजवाती .किया जाता याद उनको जिन्हें हम भूल जाते हैं ,है धड़कन माँ ही जब अपनी कहाँ है उसकी सुध जाती .वजूद माँ से है अपना ,शरीर क्या बिना उसके ,उसी की सांसों की ज्वाला हमारा जीवन चलवाती .शब्दों में नहीं बंधती ,भावों में नहीं बहती ,कड़क चट्टान की मानिंद हौसले हममे भर जाती .करे कुर्बान खुद को माँ,सदा औलाद की खातिर ,क्या चौबीस घंटे में एक पल भी माँ है भारी पड़ जाती .मनाओ इस दिवस को तुम उमंग उत्साह से भरकर ,बाद इसके किसी भी दिन क्या माँ है याद फिर आती .बाँटो ''शालिनी''के संग रोज़ गम ख़ुशी माँ के, फिर ऐसे पाखंडों को ढोने की नौबत नहीं आती . शालिनी कौशिक [कौशल]
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